कविताएँ > बने हम शक्तिशाली
बने हम शक्तिशाली
किसी के खंज़र घुसा था सीने में
गोलियाँ कईयों ने खायी थी
सीने से लगा कर तोपों को
लाशें अपनी बिछाई थी
दहल गया था आसमान
जब दहाड़ लक्ष्मीबाई ने लगाई थी
भूकंप सा था उठा
जब चेतक ने छलांग लगाई थी
आन पड़ी जब धर्मसंकट
मंगल ने आवाज़ उठायी थी
रोटी-कमल का प्राण ले
सन-सत्तावन में शुरू हुई लड़ाई थी।
फिर गाथा शुरू हुई बलिदानों की
माँ भारती को आज़ाद कराने की
दौर चला विरोधों का
अनजान हज़ारो मौतों का
लेने आज़ादी अड़े रहें
सीना तान कर खड़े रहें
काला पानी से भी डरें नहीं
हार कर भी झुकें नहीं
डरती थी दीवारें सलाखों की
रूह काँप जाती थी जल्लादों की
वो तो हँसते-हँसते कुर्बान हुए
सपना आज़ादी का और होठों पे मुस्कान लिए।
आजकल आज़ादी के व्याख्यान बहुत बड़ें हैं
भूल गये उनको, जिनके वजह से बेफ़िक्र रहें हैं
भूल चुके है नाम, हम उन रणधीरों का
विजयी इतिहास उन वीरों का
उनकी बहनें, उनकी माताओं का
जहाँ पले-बड़े उस गाँवों का
जिनके नाम पर नही कोई राह कहीं
गुमनाम हुई पीढियाँ, जाने कहाँ कराह रही
कितने मर गये किन गली-चौबारों में
नहीं छपा कहीं नाम अखबारों में।
आज़ादी तो दिलाई थी उन्होंने इस हिन्दुस्तान को
ना किसी हिन्दू को, ना किसी मुसलमान को
देखो कैसे नासूर बना ये शब्द आज जातीय है
कोई गुजराती तो कोई मद्रासी है
गांधीजी बन गये बनिया भारी
आज़ाद बन गए पंडित तिवारी
पटेल बन कर रह गये हैं कुर्मी नेता
मौलाना रहे मुस्लिम प्रणेता
ना चाहते हुए भी
आज हम इस देश को है तोड़ रहे
वीरो के बलिदान को
अपने स्वार्थ से है जोड़ रहे।
समय है हम बने फिर से
सहस्तित्व संयमी विचार
प्रयास रहे की ना हो
इस मिटटी से दुर्व्यवहार
प्रयास रहे की बने भारत
विश्व में बलशाली
बने हम आत्मनिर्भर
और बने शक्तिशाली।