कविताएँ > आख़िरी सलाम

आख़िरी सलाम

भटके नहीं हैं, बस निकल पड़े हैं

उस तक का रास्ता भी पता है

पर अब वो मन्ज़िल नहीं हैं

कभी जब सच में भटक जाएंगे न

तब लौटकर आयेंगे

खुदको खोजते हुए

वक़्त को कोसते हुए

उन लम्हो को फिर से जीने

वो बिताए कुछ साल छिनने

शायद, छीन नहीं पायेंगे

पर एक बार फिर जरूर आयेंगे

खोजने अपने यारों को

खोजने उन तमाम चेहरों को

सुनने उन बातों को

गुजारने उन जागती रातों को

खोजने उन पहली मुलाकातों को

डुबोने नशे में आँखों को

हम फिर से उसी जगह बैठेंगे

औरों का इंतज़ार करेंगे

हर गुजरते शख्श को घूरेंगे

उनमे तुम्हें ढूंढेंगे

मुझे मालूम है, तुम नहीं आओगे

मतलब ये थोड़ी है

कि हम इंतज़ार नहीं करेंगे।

हर उस जगह जाऊँगा तुम्हे खोजने

जहा कभी निकले थें साथ घूमने

कही तो नज़र आ ही जाओगे

तुम भी कबतक इन यादों को दबाओगे

कब तक गानों पर सिर्फ गर्दन हिलाओगे

कब तक गालियाँ होठों में दबाओगे

कब तक ड्यूटी के डर से

शराब को हाथ नहीं लगाओगे

कब तक, हमे भुला पाओगे

अगर मिले न कही, तो हँसकर मिलेंगे

चलेंगे कहीं

फिरसे यादों को तस्वीरों में कैद करेंगे

लेकिन अगर ना मिले मतलब ये थोड़ी

कि हम इंतज़ार नहीं करेंगे।

जमाना बहुत दर्द देनेवाला है

लेकिन जब दर्द में झुकने लगो न

तो वो जन्मदिन पे मिला दर्द याद करना

फिर गले से लगने वाले हमदर्द याद करना

वहाँ शायद कोई तुम्हे गले नहीं लगाएगा

याद रखना

हमे याद करना

एक लंबी सांस भरना

थोड़ा रो भी लेना

दुबारा मिलने की उम्मीद में

फिर से आगे बढ़ना

पर जबतक नहीं मिलेंगे

ऐसा थोड़ी है

कि हम इंतज़ार नही करेंगे।

अभी तो एक लम्बी छुट्टी शुरू होने वाली है

इसीलिए हो सके तो बातें थोड़ी ज़्यादा करना

गले ज़रा जोर से लगाना

थोड़ा एक बोतल ज्यादा पी जाना

ज्यादा ज़ोर से हँसना और ज्यादा मुस्कुराना

कुछ रह गया हो तो बोल देना

इश्क-मोहब्बत के सारे राज खोल देना

रास्तों पर मेरे साथ थोड़ा धीरे-धीरे चलना

हाँ वक़्त नहीं है शायद

फिर भी हो सके

तो यार

थोड़ा देर से निकलना।