कविताएँ > चंचल चितवन
चंचल चितवन
वो उसका चंचल चितवन
साथ में उसकी शोख अदायें
देख जिसे कलियाँ खिल जायें
भवरे मिलके गीत सुनायें
मध की वह मीठी बूंदें
अपने होठों से दबायें
फैला चमेली-सी खुशबू
जब हल्के-हल्के क़दम बढायें
देख उसे यूँ मन भरमाये
और देखूँ तो जी घबराए
वो उसका चंचल चितवन
साथ में उसकी शोख अदायें।
जुल्फ़ सुनहरे जब किरणों को रोके
शाम-सा ढल जायें
लहरा के जब पास से गुजरे,
ठंड झोंके-सा छू जाये
मंद-मंद सी बोली है
जैसे बलखाती लहरे गाएँ
कूक्के कोई कोयलिया
संग झिंगुर तान मिलाये
वो उसका चंचल चितवन
साथ में उसकी शोख अदायें।
छटा वह निराली है
गुलाबों की सवारी है
बैठने की भूल ना कीजौ
खुशबू साँसों पर भारी है
उपरवाले ने भी मानो
दो कुदरत है बनाये
एक जिसमे बसा हूँ मैं
एक जिसमे, तू मुस्काये तो बस जाएँ
वो उसका चंचल चितवन
साथ में उसकी शोख अदायें।