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इंसान क्या है?

इंसान क्या है

किसी लेखक का ख्याल है

शाख के पत्ते सा है

पत्ते से लगे ओस सा है

कभी कोमल तो कभी ठोस सा है

वक़्त-दर-वक़्त बदलती सोच सा है

इस कुदरत का मीत है इंसान

अच्छे-बुरे सुरों का गीत है इंसान

कभी समंदर का ठहराव है

तो कभी लहरों का वेग है इंसान

एक पंछी की पहली उड़ान है इंसान

उड़ कर आसमान को भी पार करता इंसान

रवि के तेज सा है

तूफ़ान के वेग सा है

बादलों की गर्जन है

धरती का कंपन है

बरखा सा शीतल है

सौंधी सी खुशबू है इंसान

अंकुरित बीज हैं इंसान

वृक्ष पतित है इंसान

बागों का गुलमोहर भी है

कीचड़ का कमल भी है

चंपा की खुशबू है

हर रंग से रूबरू है इंसान

किसी राहगीर की आस है

मृगतृष्णा की प्यास है

रात का बिम्ब है

प्रकृति का प्रतिबिम्ब है इंसान

खुद ही रक्षक

खुद ही भक्षक है इंसान

वक़्त को पहचान देकर

उसी में खुदको गवाने वाला है इंसान

जन्म और मरण के बीच का अंतराल है इंसान

एक सवाल है इंसान।