कविताएँ > जश्न जीत का
जश्न जीत का
जो ख़्वाब सारे बुन रहे हो
रास्ते तुम चुन रहे हो
क्या तुम्हें मंज़िल का पता है
या आँखों पर कोई धुंध चढ़ा है।
देखने में मोड़ हर एक
हसीन है, हरा भरा है
तू थम ज़रा आराम कर ले
लक्ष्य की पहचान कर ले।
जिद्द पे तू क्यों अड़ा है
बस भागता है गिर रहा है
पर तुझे समझाये कौन
ना रुक रहा ना सुन रहा है।
जीतना है ज़िन्दगी से
पार पाना बन्दगी से
सोच ये तेरी अगर है
काल तेरे द्वार पर है।
इस बात की भनक नहीं
की जीतना ही सब नहीं
जीत मयजाल से पर
जीत माया को नहीं।
जीत सब कुछ सकता है
पर त्याग को जो मन नहीं
ले प्रण तू छोड़ चला जा
तेरे लिए ये रण नहीं।
जोर नहीं कृपाण का
बस त्याग का ही काम है
वो हर्ष हाहाकार में
व्यंग के समान है।
वो मृतों का अपमान है
जो जीवितों का सम्मान है
तुझे रक्त की प्यास है
बुझ गयी, उल्लास है।
वो मृत शरीर वो मौन है
वो था कल अब कौन है
हाथों से लहू पसीजता
क्या यही जश्न है जीत का।