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कलकार

मैं गीत गाता हूँ, मैं कविता सुनाता हूँ

बेरंग होती दुनियाँ को रंगों से सजाता हूँ

स्याह सन्नाटो में आशा की धुन बजाता हूँ

मिट्टी को आकार दे मूरत बनाता हूँ

मुस्कुराहटों को तस्वीरों में सजाता हूँ

प्रकृति की आवाज़ को थिरकन बनाता हूँ

मैं ही राम, मैं ही रावण का किरदार निभाता हूँ

अपने धर्म से नहीं बल्कि कर्म से जाना जाता हूँ

मैं कलाकार कहलाता हूँ।

मेरा मूल कोई आकार नहीं है

मेरा नियमित कोई व्यवहार नहीं है

मैं परे हूँ तुम्हारे नियम और कानूनों से

मैं पर हूँ तुम्हारे शारीरिक जुनूनों से

तुम में हूँ, तुम्हारे आस पास हूँ

तुम इस दुनिया में उलझे

मैं ख़ुद के ब्रह्मांड में करता वास हूँ

विपदा को मोड़ देने का हुनर रखता हूँ

चुनौतियों के सामने विजयी हुंकार भरता हूँ

मैं कलाकार कहलाता हूँ।

दुनिया के मायाजाल से आजाद हूँ

पैसो को लेकर थोडा बर्बाद हूँ

चुप-चाप-सा रहता हूँ

पर लिखता इंक़लाब हूँ

औरो के नज़रों में बेकार कहलाता हूँ

मैं कलाकार कहलाता हूँ।