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कर्मयोग
तुम निज काम निरंतर किये चलो
स्नेह का प्याला पिये चलो
ना डरो, न थको ना झुका करो
हो मंद मगर ना रुका करो
हर दिन नया उद्देश्य गढ़ो
जिसका प्रयास पूरा करो
शुभ कार्य में तुम लीन रहो
हो अन्याय तो ना धीर धरो
जो लड़ सको तो वीर बनो
शिव जैसा तांडव करो
पर कृष्ण सा कोमल भी हो
ना बैर करो तुम मित्र बनो
कोई दीन मिले अनुदान करो
तुम नहीं कभी अभिमान करो
शब्दों में रस तुम प्रेम भरो
ना रोष की सीमा पार करो
जितना रहो संतुष्ट रहो
मेहनत करो ना छीन सको
प्रीति का कारण बनो
प्रीत प्रचार तुम किया करो
द्वेष ना रोपा करो
विष कभी ना बुना करो
आनंदमय विचकर रखो
आनन्द भरो तुम जहाँ रहो
सर्वधर्म सम्मान करो
पर स्वधर्म कभी जो निर्बल हो
अपना स्वरूप विकराल करो
तुम भैरव बनो चंडी बनो
अधर्म का तुम नाश करो
अनिवार्य नहीं तुम क्षत्रीय हो
बन सको ब्राह्मण बनो
बोध का विस्तार करो
ऐसा कोई सुकार्य करो
अनभिज्ञता का संहार करो
मस्तिष्क कभी ना झुकने दो
आँखों से ऊर्जा संचार करो
इस मिट्टी के कर्ज़दार बनो
ना इस राष्ट्र का व्यापार करो
नित्य विजयी हुंकार भरो
तुम विश्व पटल पर नाम करो
तुम निज कीर्तिमान गढ़ो
तुम राष्ट्रनिर्माण को काम करो
सबसे बढ़कर देश का सम्मान करो
और अनिवार्य नहीं कि तुम क्षत्रिय हो
बस निज काम निरंतर किये चलो
ना थको, ना डरो, ना झुका करो
हो मंद मगर ना रुका करो।