कविताएँ > कुछ पल का हमसफ़र

कुछ पल का हमसफ़र

मैं छू कर दिल दीवानी का, हल्के से चला आया

दिल में प्रेम की ज्योति, मैं उसके जला आया

जाने कब वो लो अंगार में कैसे बदल गयी

हर तरफ़ धुँआ-धुँआ, उसके साँसों से चैन आया।

मैं मदिरा डूब के उसमे, कुछ ऐसे भरमाया

आजतक लोग पीते थें मुझे, मैं आज पी आया

मैं भटकता दूर तक चलता गया उसको भुलाने को

नशे में वो नज़र आया, होश में वो नज़र आया।

राह लम्बी कटीली थी, शिविर उसका नज़र आया

मैं दुविधा से पड़ा राही, ठहर कर ख़ूब पछताया

मैं दो टक देखता ही रह गया उसको शराफ़त से

जब उसने मुझे देखा, तो मन्जिल नज़र आया।

नैन उसके खुराफाती, मैं संग खेलना चाहा

वो मुझको देखकर हँसती, मैं बस देखना चाहा

वो पलकें यूँ उठाती थी, वो पलकें यूँ झुकाती थी

उठे तो हो सुबह मेरी, झुके तो चाँद सर आया।

बातों में शेर वह गढ़ती, मैं भी वाह-वाह चिल्लाया

सरगम से बोल हैं उसके, गीत रचता चला आया

वो एक दिन मौन रह पूछी, मुझे अब क्या लिखोगे तुम

जब मैं लिख ना फिर पाया, उसका नाम लिख आया।

वो उसके होंठ की लाली नथ नन्हा लटकाया

श्याम कुंतल झटकने से लगा सावन छलक आया

मैं तो देखता ही रह गया पावन-सी सूरत को

भटकती नाव को जैसे साहिल नज़र आया।

मेरी वीरान पड़ी राहों को संदल-सा महकाया

उसके कदमों की आहट भर से बहार था आया

हर मोड़ पर उसकी छवि मुझे राह दिखाती थी

संग उसके सफ़र हरपल, मंज़िल नज़र आया।