कविताएँ >क्या बतातें
क्या बतातें
अपना हाल क्या बतातें
किसी को दिल क्या दिखातें
जिन सलवटों में तलाश रहे निशान उनके
उस बिस्तर पे किसी को क्या बिठातें
मुस्तकबिल जो ख़्वाब में बदल गए
ख़्वाब जो सुबह हुए बिखर गए
रात गुजरने लगी याद में, इंतज़ार में
जो कहकर गये थें, लौटेंगे, किधर गये
मेरे हर हर्फ़ में गूँजता उसका नाम था
शेर, शायरी ओ ग़ज़ल सबमें उसका नाम था
अब कैसे पढूँ लिखा अपना और कैसे लिखूँ
वो तो अब था ही नहीं लिखा जिसका नाम था
कौन कहेगा ये अब घर लगता है
मेरा दिल-ओ-मकान अब बंजर लगता है
खो रहीं दीवारें अधूरे फसानों के कोहरे में
खिड़की भी खोलता हूँ तो दीवार से जा लगता है
वो था हक़ीक़त, यकीन कैसे दिलातें
अब दिल किसी को क्या दिखातें
एक शख़्स था, जो आँखें पढ़ लेता था
अब कब से है जागे, किसी को क्या बताते।