कविताएँ > क्या बताऊं
क्या बताऊं
कितना ही वक़्त गुजरा यहाँ ठहरें
गुजरें कई जाने-अनजाने चहरें
उनमे भी बस एक वो पसन्द आया
क्या बताऊँ!
सफर में ठहरने का कितना मज़ा आया।
वो गुजरे जैसे भादो की आखिरी फुहार हो
रोक लूँ या झूम लूँ उलझन कई बार हो
उनका एक छुअन जाने क्या रंग लाया
क्या बताऊँ!
उनका इश्क़ मुझपे किस क़दर छाया।
बैठी थी कलियां ऐसे मुँह फुलाये
रूठी बगिया, कौन कैसे मनाये
वो तितली बन इस क़दर मुझपे मंडराया
क्या बताऊँ!
उसके महक में ये बाग़ कैसे नहाया।
वो दुप्पट्टा उनका ऐसे चढ़ता मुझपे
ढकते हो आसमान को मेघ जैसे
जब भी जमीन तडपी, बरसा, प्यास बुझाया
क्या बताऊँ!
उस दिन तुझमे भीग मैं कैसे नहाया।
तेरे इंतज़ार का भी अलग ही एहसास रहा
बढ़ती दूरियों में भी तू हमेशा पास रहा
याद आया तू जब, तब-तब तुझमे खोया
क्या बताऊँ!
उस रात तकिये को पकड़ मैं कैसे रोया।