कविताएँ > क्या लिखूं
क्या लिखूं
सोच के थक जाता हूँ
अक्सर
जब भी ये सोचता हूँ
कि
क्या लिखूँ
उन सर्द हवाओं को
जो मुझे आंतरिक तृप्ति देती है
या लिखूँ
उन घनघोर घटाओं को
जो नवजीवन सृजन करती हैं
क्या लिखूँ
उस सौंधी खुशबू को
जिससे लिपट बचपन बीत गया
या लिखूँ
मेरी माँ का आँचल
जिसमें भटका ये जीवन सिमट गया
क्या लिखूँ
उस दो रुपये के सिक्के को
जिससे हर खुशियाँ खरीद लेता था
या लिखूँ
अपनी उस टोली को
जिनसे हर रोज़ झगड़ लेता था
क्या लिखूँ
बदन के उस घाव को
जिसे रेत से ढक लिया करता था
या लिखूँ
तालाब के उस बहाव को
जिसमें हर शाम खेला करता था
क्या लिखूँ
उन फटे कपड़ों को
जिनपे कभी ध्यान नहीं गया
या लिखूँ
घिसे-टूटे चप्पल को
जिनसे रफ्तार कम न हुआ
क्यों ना लिखूँ
बचपन का कोई गुजरा हुआ दिन
जो दिन मानो जीने को कम पड़ गया
क्यों ना लिखूँ
वो अनदेखी रातें
जो कल के इंतज़ार में सो गया
क्यों ना लिखूँ
मैं खुद को
जो 'मैं' किसी मोड़ पे खो गया।