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मुसाफ़िर
आज ज़माने की इस भीड़ से
निकला एक सफ़र के लिए
एक ज़माना अपना भी होगा
ये सोच चला मुसाफ़िर बने।
मुमकिन है औरों से अलग लोग तमाशा समझेंगे
ठोकर खाता देख बेतहासा हसेंगे
मै भी तो बार-बार गिरूँगा
पर उन तमाशदारो के आगे नही झुकूँगा
मै हर बार उठूँगा
आँखों में तेज लिए
होठों पे मुस्कान लिए
चलता रहूँगा मुसाफ़िर बने।
माना वक़्त है अभी लहरों में फसा हूँ
मैंने समंदर नहीं है देखा
पर कुदरत से सीखा है
मैंने भी जीने का सलीका
वक़्त के साथ बदलते रहने का तरीका
अभी वक़्त लगेगा मुझे चट्टान से ज़मीन बनने में
तबतक तराशुंगा खुदको मुसाफ़िर बने।
मैंने सपनें बहुत है देखें
सपनों में ज़िया नहीं लेकिन
सोचता भी बहुत हूँ
सिर्फ सोचता रहा नहीं लेकिन
कई बार पाये मुकामों को मैंने दाव पर लगाया है
फिर हार गया, पर ग़म एक ज़रा नहीं मनाया है
बस फिर झोंक देता हूँ खुदको बड़ी जीत की तैयारी में
और जबतक जीत नहीं जाता
चलता रहूँगा मुसाफ़िर बने।
परवाह नहीं मुझे, मुझपर ज़माना फक्र करे
वैसा कुछ करूँ कि मरकर भी याद करे
असल जीत तो तब होगी जब आयने के सामने रहूँ
फिर जिस शख़्स से नज़रे मिले
ना शर्म रहे, ना नज़रें झुकें
वो शख़्स मुझपर फक्र करे
तबतक ना ये सर झुकेगा, ना ये कदम रुकेंगे
चलता रहूँगा मुसाफ़िर बने।
आज ज़माने की इस भीड़ से
निकला एक सफ़र के लिए
एक ज़माना अपना भी होगा
ये सोच चला मुसाफ़िर बने।