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पतझड़ का पत्ता

पतझड़ के मौसम में

शाख़ से बिछड़े पत्तें

टकरा हवाओं से

पेड़ की तह में पहुँचें

कुछ कुचले गए सड़कों पर

कुछ दूसरे शाखों पर जा अटकें

बन कश्ती लहरों में

कुछ दरिया में थें भटकें

कुछ टूट गयें पतझड़ से पहले

या दरख्तों संग गिरना हुआ

हरे-भरे यौवन में कुछ का

जमीन से जा मिलना हुआ

पर जिसको गिरना नागवार हुआ

वह बह अनंत बढ़ता गया

तोड़ बेड़ियाँ शाखों की

स्वमार्ग सतत गढ़ता गया

ज्यों टूटा, थोड़ा अलहड़ था

तुच्छ, तुनक और तनहा था

डरता था गिरने से पर जब

अब ठान लिया कुछ करना था

हवा मंद हुई, मध्यम हुई

तेज़ हुई, तूफ़ान बनी

वो पंछी अब आवारा था

उसकी ज़मीन से ना बनी

देखना है कितना लम्बा उड़ान होगा

लांघ जाने को पूरा आसमान होगा

हवा भी बदलेगी, मौसम बदलेगा

वो ना बदला तब कमाल होगा

मालूम है एक दिन ज़मीन पे भी आ गिरेगा

जिस दिन आवारा खयालातों से डरने लगेगा

उस दिन जब बड़ी तेज़ बरसात होगी

उस दिन जब ज़मीन से उसकी बात होगी।