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प्रेमनदी

लहरे मोहब्बत की

टकरा किनारों से

छिटकी जो आँखों में

दिवाना कर गयी

कुछ बूँदों ने बेसुध कर दिया

कुछ और पाने की चाह में

ज्यों जिह्वा से लगी

मधुशाला कर गयी

चाहत की खुशबू थी

मखमल से रेशें

उसके गेसुओं से खुरचें

मुझसे टकराई सिहरन कर गयी

कब से तलाश थी

जिस प्रेम की आस थी

मेरा तुझसे मिलना

मुकम्मल कर गयी

क्या बताऊँ

कैसी थी वह प्रेमनदी

शहद-सा स्वाद

शीतल एहसास

शांत एक सहर

मंद-मंद लहर

प्रबल एक आस

भिगोने की प्यास।