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सवाल

छुप नहीं सकता स्वयं से

स्वरचित जो दाग है

जला भी दोगे पाप सारे

क्या करोगे जो राख है

तुम क़र्ज़ आसुओं का क्या उतारोगे

कमा सकती नहीं कोई लाश है

वादे भी क्या याद रखोगे

तेरी धुरी उड़ता कपास है

आज कहते फिर यूँ बदलते

जैसे तन नहीं बस लिवास है

नाज तुझे सजने पे हो शायद

पर तुझसे लगा हर शृंगार बकवास है

कितना कहोगे, कबतक कहोगे

सुन भी लो जो आवाज़ है

बाँध दोगे जंजीरों में पर सुनलो

इंक़लाब को ये लब आज़ाद है

नज़र भी दौड़ाओ कभी

टूटी आवाम की खोली है

तेरे कम्बल के इंतज़ार मे

ठिठुरती ठंड में सो रही है

अब नज़र नहीं आते हो

अपना बनाया था न

बैठ साथ ज़मीन पर

रोटी तुमने खाया था न

इंतज़ार के मारे नज़रें

देखो कैसे गहराई हैं

नज़र चुरा कर निकल रहे

उपर से गॉगल्स भी लगाई है

ढोल नगाड़े कितने सारे

हमने भी तो देखे थें

पर शोर तेरे ढिंढोरों के

बड़े अनोखे थें

आज बने हो राजा

कल फ़कीर बताते फिरते थे

टांग चढ़ाए बैठे हो

टांग दबाये फिरते थे

गलती नहीं तुम्हारी

कि हमारे ऐसे हालात है

गलती हुयी हमारी

कि गधे कर रहे राज है

पेट भरने के चक्कर में देखो

चर्बी का पैमाना भूल गये

खुद बैठ AC दफ्तर में

चूल्हों में आग जलाना भूल गये

तुम जो अक्सर रौब अपने

ताकत का दिखाया करते हो

इतनी भी क्या गर्मी बदन में

शोलों में आग भरते हो

याद रखना एक दिन

ये आग ज़रूर भड़केगा

आज धड़क रहा हैं सीने में

कल तेरे सीने पर धधकेगा

कि छुप नहीं सकता किसी से

जो रचित तुम्हारा दाग है

जला देना पापों को अपने

जला देंगे जो बची राख है।