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शिक्षक

वो अडिग, अमल, अभिसारी है

वो श्रेष्ठ, सकल, गतिधारी है

सूर्य सा उसमे तेज़ भरा है

ज्ञान का उसमे वेग खरा है

उसको कण-कण ज्ञात हुआ है

उससे नवजीवन प्राप्त हुआ है

वो जग सिरमौर है

उससे दिव्य, कहो क्या कोई और है

वो खुद में एक पुस्तक है

जिसका पन्ना-पन्ना सिखलाने को उत्सुक है

उससे सम्पूर्ण नहीं कोई आकार है

वो ब्रह्मा, विष्णु, महेश तीनो का अवतार है

वो कृष्ण है उस पार्थ का

राम का विश्वामित्र है

महाभारत का व्यास है

वो परशुराम है, द्रोणाचार्य है

वो वाल्मीकि है, वो वशिष्ठ है

बृहस्पति है देवों का

दैत्यों का शुक्राचार्य है

वो सर्वपल्ली है, सावित्रीबाई है

दयानंद है, प्रेमचंद है

चाणक्य हैं वो, टैगोर है वो

वो ही विवेकानंद है

और वो ही कलाम भी है

गुरु है तो ईश्वर के होने का प्रमाण है

उसके ज्ञान को करता ये जग प्रणाम है

कह रहा हूँ आज, हमारी हृदय वेदना सुन लेना

नित्य चरणों में झुकता रहूँगा

बस कृपादृष्टि दिये रखना।