कविताएँ >तलाश
तलाश
रात हटी तो सब नज़र आया
अमावस से ज़्यादा अँधेरा नज़र आया
गया काफ़ी दूर तक
मैं उजाले की तलाश में
पर सब तरफ खड़ा मैं ही मैं नज़र आया
स्वप्न-सा लगता था
पर दिन भी तो हो रहा था
फिर भी अँधेरा था
मानो मैं सो रहा था
मैं अब भी तलाश में था
कहीं दिखे उम्मीद इस आस में था
रात दिखी फिर से सवर रही थी
दिन से भी जैसे झगड़ रही थी
अँधेरा और गहरा होने वाला था
तलाश अधूरा रहने वाला था
मेरी ज़िद्द थी या मज़बूरी में था
सो जाता मैं भी
लगा जागना ज़रूरी-सा था
सब तरफ़ मैं था
मैं फिर भी तलाश में था
क्या मालूम था जिसे खोजता
वो आग मेरे पास में था
कहीं बुझ चुका था
कहीं झोंके की तलाश में था
सब तरफ़ मैं था
मेरे ही अंदर आग थी
मैंने ख़ुद को जो खोजा
मिली जो खोई आग थी
सब तरफ़ उजाला था
जो रात थी, जा चुकी थी।