कविताएँ > थक पथिक
थक पथिक
थक पथिक घुटनो बल ऐसे बैठा
'आखिरी विश्राम है' मानो वह कहता
नैन उसके भू को ऐसे गड़र रहे थें
उंगलियां मिट्टी को जैसे जकड़ रहे थें
स्वेद कपाल का कन-कन को भिगोता था
उस पथिक के छांव में राह भी सोता था
धड़कनों के लगते लगातार गोतों का
असर दिख रहा था उन सूखते होठों का
तपिश बदन की कुछ ऐसे बढ़ रही थी
आग अंदर की जैसे पिघल रही थी
दिख रहा था वर्षों का थकान वो
फिर भी टिका था मानो राह ही मकान हो
कंधे जैसे धरती से मिलने को बेताब हो
झुकाता उनको शायद कई अपनो का ख़्वाब हो
उससे शायद अम्बर का मेघ भी रूठा था
की उसके छांव का साथ जाने कब छूटा था
एक दिमाग था जो और हिलने नहीं देता था
दिल था आराम करने नही देता था
सुनता किसकी की तनु साथ न था
उस आग में अब वो बात न था
वो झुका रहा वहीं ख़ुद को समझाने में
ख़्वाब समेटते बढ़ने की ताकत जुटाने में
पर भौ उसके आंखों के कही कस गए थे
पांव वहाँ मिट्टी में धस गये थे
वो आँखों पे चढ़ते उस अंधेरे को धिक्कार रहा था
वो पल-पल खुद से ही हार रहा था
धीमी होती साँसें उसके उम्मीदों को झुठला रही थी
रजन की एक घूँट भी उसको हिला रही थी
'आखिरी विश्राम है' मानो वो कहता था
थक पथिक घुटनो बल ऐसे बैठा था।