कविताएँ > ठहरो या चले जाओ

ठहरो या चले जाओ

सुनो ज़्यादा करीब मत आओ

दूर से ही दिल में उतर जाओ

मैं तुम्हें रहने को थोड़ी जगह दे दूँगा

तुम कुछ देर मेरी साँसें बन जाओ

अभी हालात बिखरे-बिखरे हैं

मैं हारता जाता हूँ

तुम मेरा हाथ पकड़ो

मुझे खुदसे लड़ना सिखाओ

बाक़ी तुम्हारी मर्ज़ी है

ठहरो या चले जाओ।

पर जबतक इस जगह रहो

यूँ पराया ना बनाओ

मैं लड़खड़ा जाता हूँ

लड़खड़ाता देख गले से लगाओ

थोड़ा अपना वक़्त जाया करो

मुझे सम्भलने को थोड़ा वक़्त देते जाओ

तुम्हे रास्ते दिखाने की ज़रूरत नहीं

बस मेरे साथ चलते जाओ

बाक़ी तुम्हारी मर्ज़ी है

ठहरो या चले जाओ।

लेकिन जबतक साथ चलो

गिरा देख मुँह ना मोड़ो

हाथ बढ़ाओ

पूरी ज़िंदगी नहीँ

बस जरा-सा वक़्त देते जाओ

कभी झूठा ही सही

साथ ज़रा मुस्कुराओ

रंजिशें भूल बड़े बन जाओ

बाक़ी तुम्हारी मर्ज़ी है

ठहरो या चले जाओ।