कविताएँ >तुम याद आते हो
तुम याद आते हो
सुबह की अंगड़ाई में
उस उबलती चाय में
तलवों को ठंडक देती
बिछी ओस की रजाई में
मुझे! तुम याद आते हो।
जब चलती है शीत बयार
गिरती सिहरन की फुहार
उस गर्म चादर से
जब होने लगता सरोकार
मुझे! तुम याद आते हो।
बादलो संग खेलकर
रात को धकेल कर
हर तरफ चमक बिखेरने
जब निकलता भास्कर
मुझे! तुम याद आते हो।
मृदु सांझ की पुरवाई में
जब कहीं तराई में
झिंगुर कोई तान बुने
रात के इंतज़ार में
मुझे! तुम याद आते हो।
स्याह रात की गहराई में
चाँद की अंगड़ाई में
तारों के छाँव तले
उस आराम भरी तन्हाई में
मुझे! तुम याद आते हो।
बिस्तरों के सलवटों में
अनवरत बदलते करवटों में
पास से देखते नींद के
आस में गुजरते लम्हों में
मुझे! तुम याद आते हो।