कविताएँ > उड़ान बाक़ी है
उड़ान बाक़ी है
अभी थका नहीं हूँ, कि मेरी उड़ान बाक़ी है
मैं रुक न सकता, कि उड़ने को पूरा आसमान बाक़ी है।
सपने कई कन्धों पे, लीये मैं आगे बढ़ रहा
तोड़ रुकावटो की चट्टाने, नये रास्तें गढ़ रहा
अभी मंज़िल तक को एक ठोस राह बनाना बाक़ी है
मुश्किलों के ढेर का पर्वत गिराना बाक़ी है
अभी थका नहीं हूँ, कि मेरी उड़ान बाक़ी है।
समंदर की हल्की तरंगों-सी है आशाएँ मेरी
छोटी-छोटी पर बहुत सारी
उन तरंगों को उनके मुकाम तक पहुचना बाक़ी है
शांत समंदर में एक तूफान लाना बाक़ी है
अभी थका नहीं हूँ, कि मेरी उड़ान बाक़ी है।
ठहरना अबतक सीखा नहीं है मैंने
सपनो में ही जीना सीखा नहीं है मैंने
अपने ख्वाबों को अभी हक़ीक़त बनाना बाक़ी है
जो करवटें बदलने को मजबूर करें
वो ख़्वाब सजाना बाक़ी है
अभी थका नहीं हूँ, कि मेरी उड़ान बाक़ी है।