कविताएँ > उसमे गढ़ा तिरंगा हो
उसमे गढ़ा तिरंगा हो
कटिबद्ध कटीली तलवार लिए
सिंहों से भीषण हुंकार भरे
जो आवाज़ चढ़ी उस शंखनाद की
अपना जीवन कुर्बान किये
सुनकर तो ये रण भीषण-सा लगता है
गज-घोड़ों, तीर-तलवारों से अम्बर गूंजता है
ऐसी ही एक आवाज़ उस भवानी ने उठायी थी
सन सत्तावन में मस्तक पर तिलक लहू की लगाई थी
फिर चला दौर बलिदानों का
उन श्वेत-सर्पों के खेलो का
कितने ही सर धर से अलग हुए
कितने भाल को चूम गये
गोलियों से छन्नी सीनों को
उन लाल हुई जमीनों का
कदम सलाखों में जब पड़ा करते थें
देख उन्हें जेलर भी डरा करते थें
उन रेशम से जंजीरों का
व्यस्त फाँसी के फंदों का
वो परीक्षा थी हमारी
और जल्लादों के कापते कंधो का
वक़्त कहाँ था संवादों का
तरकीबें नहीं शेष समझाने का
अब था कि गुलामी मिटा जाऊँगा
बचना मात्र इस धरा को है
खुद को बचा कर भी क्या पाउँगा?
ऐसे जुनून में न जाने कितने शहीद हुए
कितनों के हमने नाम सुने
कितने ही हमको याद रहें
कितनों को हमने सम्मान दिया
कई थें, जिनका नहीं किसी ने नाम लिया
खो गए वो ऐसे,
जैसे रेत पर लिखा नाम हो
सारा जीवन ठुकरा दिया
इस देश के निर्माण को
और हे नव यौवन, तू क्यों ऐसे मौन खड़ा है
अरि लिए प्रभंजन, देश मिटाने पर अड़ा है
उठ, जाग, तोड़ सारे बंधन
देख अभी कितना काम पड़ा है
तू भी बतला दे उन्हें,
तू अज नहीं सिंह शावक है
है भस्म नहीं शमशानों का
तू प्रचंड पावक है
वो कह रहा स्वयं को काल अगर तो
तू भी तो मृत्यु में अमरत्व का जावक है
तू क्यूँ डरता आँधियों से है
तू तो जन्मा कोख माँ हिन्द से है
लहू कहाँ, शोला भरा रगों में
हौसलें तुम्हारे भगत सिंह से हैं
उठ और इस दौर की आवाज़ बन
तू ख़ुद में एक रिवाज़ बन
बाजुओं में ताकत है तेरे बदलाव लाने की
तू बस उस बदलाव का आगाज़ बन
जरुरत है किसी क्रांति की शुरुवात हो
फिर आँखें मूँदू, तो बस एक ही बात हो
की ना आँचल हो मेरी माँ का
ना किसी का दुपट्टा हो
न इच्छा हो कोई दूजी
ना कोई तमन्ना हो
आखिरी क्षण जिसमें लिपट
मैं चैन से सो जाऊँ
बस उसमे गढ़ा तिरंगा हो।