कविताएँ > वो खड़ी थी

वो खड़ी थी

वो खड़ी थी

दरवाजे की ओट लिये

चेहरे पे घूंघट लिये

हल्के होंठ झलक रहे थें

कुछ कहने को बहक रहे थें

हाथो में थी एक थाली

उसमे कटोरी पानी की

और तश्तरी पानवाली

ये सब लिये, वो खड़ी थी

कटोरी में उसका चेहरा झलकता था

वो जल होते हुए भी जाम सा लगता था

उसकी आँखों पर ओस से जमावड़े नज़र आते थें

बंदी भावनाओं के तड़प नज़र आते थें

अचानक एक ओस सरकी

जो जाम को पानी कर गयी

धड़कन को थोड़ी परेशानी कर गयी

पर वो फिर भी खड़ी थी

कितनी उम्मीदें दबी होंगी

कितनी आशाओं की बली चढ़ी होगी

रोके अश्रुओं की धारा

भारी वस्त्र और जेवरों का बोझ सारा

वो अब तक खड़ी थी

खड़ी है

और शायद खड़ी ही रहेगी।